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कर्म योगी – श्री कृष्ण


लेखक – स्व भवभूति मिश्र

कर्म कर्म है और योग योग है। दोनों की अपनी अपनी स्वतंत्र सत्ता है। दोनों भिन्न हैं एक दूसरे से। पर, दोनों के समन्वय में ही कर्म योग है। कर्म योगी दोनों का समन्वय करता हुआ जीवन यात्रा करता है, तिल तंडुल न्याय से नहीं, अपितु, प्रमाणक – रस न्याय से. भगवान श्रीकृष्ण कर्म योगियों के ज्वलंत निदर्शन थे।

न्याय दर्शन में कर्म के पांच प्रकार माने गए हैं – उत्क्षेपण, अपक्षेपण, आंकुचन, प्रसारण और गमन।:१: उत्क्षेपण -उर्ध्व में क्षेप, :२: अपक्षेपण – अधः की ओर क्षेप, :३: आंकुचन – संकुचन, :४: प्रसारण, :५: गमन। जो भी केंद्र हो, जहां भी केंद्र हो, वहां से कर्म शक्ति निकलती है और पांच रूपों में कर्म-विकास होता है। संसार के समस्त कर्मों की ये पांच हीं प्रविर्तियां हैं।

मनुष्य कर्म करता है, शरीर से, मन से और बुद्धि से। इसलिए शरीर, मन और बुद्धि केंद्र बनती है कर्म के होने में। ये तीनों ही प्रकृति के अंतर्भूत है। प्रकृति स्वयं एक शक्ति है। उसका धर्म हीं है कर्म। क्योंकि प्रकृति को जड़शक्ति के रूप में माना गया है। अतः शरीर, मन और बुद्धि से होनेवाले कर्म हीं जड़ कर्म हो जाते हैं। वे कर्म परवश हैं, वे होंगे हीं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है –

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

सब प्रकार से प्रकृति, जिन जिन गुणमय कर्मों को करती जाती है,व्यक्ति उन कर्मों का कर्त्ता अपने को मानता है, प्रकृति को नहीं। क्योंकि उसकी आत्मा अहंकार के कारण विमूढ़ रहती है।

वस्तुतः वह कर्मयोगी नही है, जो केवल कर्मों में लिप्त है, मशीन की तरह काम किये चला जा रहा है। कर्म का प्रवाह स्वयं प्रवाहित है। प्रत्येक प्राणी परवश होकर उस प्रवाह में होता चला जा रहा है। गीता में ही भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है –

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ।।

कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किये एक क्षण भी नहीं रह सकता, प्रकृति से उतपन्न गुणों के चलते विवश होकर कर्म करना हीं पड़ता है।
तब प्रश्न है कि इस परवशता से स्वतंत्रता कहां है ? भगवान ने हीं गीता में कहा है –

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः. मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥

  • ऐ अर्जुन, मैं अध्यक्ष रहता हूं, मेरे द्रष्टा मात्र रहने से प्रकृति, जड़ चेतनमय जगत की सृष्टि करती है, इसी कारण से संसार में परिवर्तन होता रहता है।

एक सिद्धांत है, कि कर्म करती है प्रकृति और पुरुष केवल उस कर्म का साक्षी बना रहता है। ऐसी स्थिति में प्रकृति पुरुष, माया-ब्रम्ह, शक्ति-शिव और राधा-कृष्ण, सीता-राम आदि युग्म बन जाते हैं। और वे कर्म कर्ता और द्रष्टा बनते हैं।

भगवान ने मयाध्यक्षेण शब्द का प्रयोग किया है, यह मैं कौन हूं ? इसका उत्तर भी गीता में ही है –

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।

  • ऐ अर्जुन, सभी प्राणियों के आशय वा हृदय में स्थित मैं हीं आत्मा हूं। आत्मा के स्वरूप में मैं हीं हूं।

यही वह स्थल है, जहां आत्मा को पहचान कर व्यक्ति कर्म और प्रकृति को भी अलग अलग पहचानता है और इसी ज्ञान में विशुद्ध आत्मा का परिचय प्राप्त करता है। तब वह समझता है आत्मा प्रेरणा की प्रेरणा से होनेवाले कर्म में उसकी स्वाधीनता है, परवशता नहीं है।

— यहीं से कर्मयोग का आरम्भ है और तब। और तब —

यत्करोषि यदशनासि, यज्जुहोसि ददसि यत्।
यत्तपस्यासि कौन्तेय, तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – ऐ अर्जुन, तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो खाते हो,जो हवन करते हो, जो दान करते हो, तपस्या करते हो – मुझे अर्पित कर दो।

इस मदर्पणम् से अभिप्राय, आत्मा को हीं अर्पित करने से है। क्योंकि उन्होंने हीं कहा है –

सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।

इसलिए सोचा जा सकता है, कि जो ज्ञानी पुरुष है, निरझीर न्याय से जिसने विश्व को समझा है, जिसकी आत्मा विकसित है, उसके सभी कर्म आत्मा को ही स्वयं अर्पित होते चले जाते हैं। और वह व्यक्ति कर्मों के बंधन में नहीं पड़ता। वही सच्चा कर्मयोगी भी है। इसी भाव का स्पष्टीकरण इस शैव भावना में है –

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहम्।
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो ।
यद्यद्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ।।

  • ऐसे कर्मयोगी के सभी कर्म विराट पुरुष की आराधना ही तो हैं।

भगवान श्रीकृष्ण सर्वात्मभाव से भरित महात्मा थे। जगत के कण कण में उन्हें अपनी आत्मा ही दिखलाई पड़ती थीं। इसका स्पष्टीकरण, उन्होंने अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराकर अर्जुन को दिया था। वैसे महान व्यक्ति हीं सच्चे अर्थों में कर्मयोगियों के निदर्शन रहे। उन्होंने ही कहा है –

भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥

उस परमात्मा के दर्शन मात्र से सभी कर्मों का क्षय हो जाता है। ऐसी स्थिति में कर्मयोग अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस अर्थ में पराकाष्ठा के कर्मयोगी थे।

सांसारिक और व्यवहारिक दृष्टि से कर्मों में ऊंच – नीच, अच्छे – बुरे , सत – असत का विचार रखते हैं। पर वास्तविक कर्मयोगी में स्वयं समभाव का विकास हो जाता है, वैसी स्थिति में उसकी दृष्टि में,

  • शुनि चैव श्वपाके च पण्डितः समदर्शिनः का भाव विकसित हो उठता है। क्योंकि व्यक्ति सर्व निरपेक्ष हो जाता है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण में समभाव का विकास पाते हैं।

एक ओर वे गोपियों और राधा से प्रेम लीला में तत्पर हैं, तो दूसरी ओर कुब्जा से प्रेम लीला में। नागलीला और रासलीला, दोनों लीलाएं उनके लिए सम हैं। द्वारिका का सिंहासन और अर्जुन का रथ दोनों हीं सामान हैं। वे राज धर्म का भी निर्वाह करना जानते हैं और सारथि के कर्म का भी। जहां एक ओर वे गोपियों का चीरहरण क्र सकते हैं, वहीं दूसरी ओर द्रौपदी का चिरवर्धन भी कर सकते हैं। हिंसा और अहिंसा का मूल्य, उनके विचार में सामान हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने चरित्र के बल पर कर्मयोगी का उच्चतम आदर्श स्थापित किया। पर, आदर्श आदर्श ही होता है साधारण जन कर्मयोग का ककहरा शुरू करते हैं, और भगवान में आस्था लाते हैं, मनन करते हैं और कर्म में तत्पर रहते हैं। फिर, वे अपने को उस उच्च स्थिति किसी न किसी दिन पाते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा भी है –
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

श्रेष्ठ व्यक्ति जो आचरण करता है, दूसरे लोग भी वही आचरण करते हैं। वही जो प्रमाण बनाता है, लोग उसी का अनुवर्तन करते हैं।

श्रीकृष्ण के आचरण विरोधाभासों से यधपि भरे हुए हैं। पर, उनमें सर्वत्र एक समन्वय सूत्र है, वही है कर्मयोग। कर्मयोग की उसी भूमिका का निर्वाह करते हुए वे एक ओर गीता का उपदेश करते हैं तो दूसरी ओर महाभारत युद्ध के परोक्ष संचालक बनकर महासंहार रचाते हैं, उनके लिए महाकवि के शब्दों में यही कहा जा सकता है –

आलोक सामान्य मचिन्त्य हेतुकं
विदषन्ति मंदाश्चरितं महात्मानम।
आज उनके अवतार की तिथि है। हम इसे सानंद मना रहे हैं।

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