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नासाग्र योग और मानसिक शांति

व्यक्ति कि असफलता का मूल कारण है – मन का विकेंद्रीकरण। मन कि चंचलता व्यक्ति को अस्थिर और अशांत किये रहती है , और व्यक्ति को शांत और स्थिर नही होने देती। फलस्वरूप , कार्यक्षमता के अनुरूप व्यक्ति को सफलता या परिणाम नही मिल पाते। चाहे आध्यात्मिक सिद्धि कि बात हो या लौकिक सिद्धि की , हर स्थिति में मानसिक केंद्रीकरण अनिवार्य पहलू है।

भारतीय संतो ने मन कि चंचलता को समझा और इसे नियंत्रित करने के लिए अपने अनुभवों के आधार पर कुछ ऐसे सरल , सुलभ उपाय बतलाये जो आम व्यक्ति भी आसानी से कर सकते हैं , और पहले दिन से हीं मानसिक शांति , स्थिरता और स्मरण शक्ति के विकाश में लाभान्वित हो सकते हैं। जिस विधि कि यहाँ चर्चा कि जा रही है उसे ” नासाग्र योग ” कहा जाता है।

नासाग्र योग —– नासाग्र , यानि नासिक का अग्र भाग। इस विधि में , व्यक्ति को अपनी दृष्टि नासिका के अग्र भाग में रखनी चाहिए और दृष्टि को उसी पर केंद्रित कर चलना चाहिए। इसका अभ्यास सूर्योदय के समय मैदान पर चल कर करना चाहिए।

अगर , चल कर करना सम्भव न हो तो घर पर या पूजा रूम में बैठ कर करना चाहिए। स्मरण शक्ति और मन के केंद्रीकरण के लिए इससे प्रभावी और इससे आसान सायद ही कोई योग या उपाय भारतीय अध्यात्म में मौजूद हो। आज्ञा चक्र कि स्थिरता और ध्यान कि अवस्था इस योग से स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं।

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