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लक्ष्मी पूजा

दीपावली में भगवती लक्ष्मी की पूजा की जाती है। दीप – मालिकाएं सजाई जाती हैं। यह आनंद और उल्लास का पर्व है। दरिद्रता के दुःसह कष्ट को हटाने के लिए भगवती के घर में आगमन का शुभ छण है, अतः यथाशक्ति प्रत्येक आस्तिक इनकी पूजा करता है। कामना रखता है कि उसके कष्टों का निवारण हो। होना ना होना, तो एकदम अलग बात है। प्रार्थना करता है –

“क्षुप्तिपासामलां ज्येष्ठाम् अलक्ष्मीं नाशयाम्यहम ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ।।

“मैं भूखा और प्यास के मल से युक्त अलक्ष्मी : दरिद्रता को, जो लक्ष्मी की बड़ी बहन हैं, नष्ट करता हूं। ऐ मां, मेरे घर से, वैभवहीनता और दीनता को, इन सारी बातों को हटाओ।”

जिस समाज का व्यक्ति इस प्रकार की प्रार्थना में लीन हो, उस देश में और समाज में दरिद्रता बनी रहे, यही महान आश्चर्य का विषय है। या हमारी प्रार्थना में बल नहीं है या हम उस महाशक्ति को भूल गए हैं, जिस महाशक्ति कि हम साधना कर रहे हैं। अशक्त बनकर महाशक्ति की उपासना व्यक्ति करे यही महान विरोधाभास है।

भारतवर्ष ,अनादि काल से शक्ति उपासक उपासक रहा, दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती आदि शक्तियों की उपासना भिन्न-भिन्न रूपों और ढांचों में यहां होती रही। निदान, व्यक्ति समाज और राष्ट्र शक्तिशाली बने रहे। सम्भवतः, उन्होंने शक्ति की उपासना का रहस्य समझा था और अंतर से वे उपासक रहे। स्वाभाविक है, व्यक्ति की शक्ति की अपनी एक निश्चित सीमा है, उसके बाद जहां वह थकता है उसे अन्य शक्ति की अपेक्षा होती है। इसी क्रम में शक्ति की उपासना की ओर व्यक्ति आगे बढ़ जाता है। भगवती लक्ष्मी की पूजा भी इसी रास्ते से उतरी है।

समाज में आज एक प्रवाद है, कि लक्ष्मी धनिकों की देवी हैं, गरीबों की नहीं। यह विषमता का दोष लक्ष्मी पर नहीं लादा जाना चाहिए। यह तो विषम भाव हममें है, जो हम ऐसी स्थिति बनाकर रखे हुए हैं। यथार्थ में लक्ष्मी तो समभाव की देवी हैं, जगतमाता हैं। फिर उनमें विषम भाव का आरोप निरर्थक है। लक्ष्मी पूजन के दिन जो असंतुलन समाज में दिखलाई पड़ता है, कि एक ओर रुपए फूंके जाते हैं, और दूसरी ओर झोपड़ियों में पड़े भूखे बच्चे भी अन्न के अभाव में बिलखते रहते हैं। यह तो हमारा दोष है। हम जग जननी की उपासना कहां करते हैं ? यदि हम सच्चे उपासक होते, तो उस रात एक अपूर्व भातृ भाव अपने अंतर में विकसित करते और दिन बंधुओं के घरों में मिठाइयां और भोज्य पदार्थों का अंबार लगा देते। यह पूजा नहीं विराट प्रदर्शन है, अपनी धन शक्ति का व्यापक अपव्य्य है।

भगवती लक्ष्मी, भगवान विष्णु की महाशक्ति हैं। पुराणों में प्रसिद्ध है, जगत की स्थिति ही विष्णु के बल पर है, यह विष्णु की स्थितिकारिणी महाशक्ति हैं। इसलिए व्यक्ति समाज और राष्ट्र की स्थिति के लिए लक्ष्मी का पूजन करता है, यह तो सबके लिए आवश्यक है। अतः यह तो निश्चित है, विषमता, असंतुलन और असंयम किसी की स्थिति को ठीक नहीं रहने देते। अतः लक्ष्मी के उपासकों को तो सम, संतुलित और संयत स्थिति बनाए रखने के लिए सदा सचेत रहना चाहिए।

उपासक और उपास्य में जब आत्मीयता उतरने लगती है, तब उपास्य के गुण, धर्म और स्वभाव उपासक में उतरने लगते हैं। निदान, वह अपने में विलक्षणता और परिवर्तन का अनुभव करता है। मान्यता है कि महाशक्ति के उपासक में असीम शक्तियों का विकास होता ही है। भगवती लक्ष्मी को इन भिन्न-भिन्न शक्तियों के रूप में माना गया है, और सोचा जा सकता है कि उपासकों में इन शक्तियों का विकास होना ही चाहिए, वे शक्तियां हैं – 1. इच्छा 2. सृष्टि : सर्जनात्मिका शक्ति 3. दयुति : कांति 4.भूति : ऐश्वर्य 5. कीर्ति : अच्छी ख्याति 6. श्रद्धा 7. दया 8. समभाव 9. श्रुति : वेद ज्ञान 10. मेधा : सद्बुद्धि 11. धृति : धीरज 12. ही : लज्जा – स्मरण रहे, निर्लज्जता में शील संकोच का अभाव रहता है 13. श्री : संपत्ति, 14. विद्या

यदि हमारे व्यक्तित्व में इन शक्तियों का विकास नहीं हो रहा है तो सोचना पड़ेगा, कि हमारे लक्ष्मी पूजन में कोई बहुत बड़ी त्रुटि है। ऐसी स्थिति में केवल मिट्टी की जड़ता ही हमारे पल्ले पड़ती है।

यह युग के परिप्रेक्ष्य में लक्ष्मी पूजन तो अति आवश्यक हो उठा है। प्रथमतः हमें शक्ति, सद्बुद्धि, स्थिति की स्थापना की शक्ति चाहिए, जिससे हम दुःख दैन्य विषमता और हिंसा आदि दुःशक्तियों का उन्मूलन कर सकें। राष्ट्रीय समृद्धि और भूति के लिए भी हमें राष्ट्रीय पर्व के रूप में इस पूजन को स्थान देना चाहिए। आज लक्ष्मी की प्रार्थना का स्वर हमारा यह होना चाहिए –

विज्ञान वृद्धिम् हृदये कुरु श्री:
सौभाग्य वृद्धिं कुरु मे गृहे श्री:
सदासुवृष्टिम् कुरुतां मयि श्री:
सुवर्ण वृद्धिम् कुरु मे करे श्री: ।

कमलात्मिका हृदय, श्लोक 34 – ऐ लक्ष्मी, मेरे हृदय में विज्ञान की वृद्धि, घर में सौभाग्य की वृद्धि करो, मुझ में दया की वृद्धि करो और घर में सुवर्ण : सोना, अच्छी भाषा की वृद्धि करो ।

वस्तुतः, विज्ञान के साथ दया, स्वर्ण के साथ सौभाग्य यदि घर-घर में जुट जाएं, तो सारा संसार सुख से भर जाए। पर, ऐसा कहां हो रहा है ? विज्ञान हिंसा के साथ उतर रहा है, सुवर्ण दुर्भाग्य, दुर्बुद्धि और अहंकार को साथ लिए दिए आ रहा है। क्या हम सचमुच आज लक्ष्मी की पूजा कर रहे हैं ? यदि नहीं तो, फिर हमें अपने उस पूजन पर नए सिरे से सोचना चाहिए।

लक्ष्मी पूजा के दिन जो दीप मालिका सजाई जाती है, वह तो भगवती लक्ष्मी के लिए दीपदान है, हर व्यक्ति पूजन के समय एक श्लोक पड़ता है –

अग्नि ज्योर्ति: रवि: ज्योतिः,
चंद्रो ज्योति स्तथैव च।
उत्तमः सर्व ज्योतीनां
दीपोयं प्रति गृह्यताम ।

अग्नि, सूर्य, चंद्र यह ज्योतियां हैं। पर, इनमें सबसे उत्तम ज्योति यही है, जो मेरा दीपक है। इसे ही ग्रहण कीजिए। प्रश्न यह है कि क्या मिट्टी का दीप सबसे उत्तम है ? या इसमें कुछ और निगुण तथ्य है ? लगता है, भावना का, श्रद्धा का, विश्वास का और आत्मा का दीप ही सबसे उत्तम हो सकता है। तो फिर भावना, श्रद्धा, विश्वास की शिथिलता लेकर जड़ अंतर से जो दीप जलाए जाते हैं, क्या वे जगत जननी के लिए ग्राह्य होंगे ? यदि नहीं, तो फिर नए सिरे से हमें दीप मालिका सजाने का अर्थ सोचना पड़ेगा। हमें सोचना पड़ेगा कि स्थूल दीपक ही यदि उत्तम दीपक है, तो उन्नत प्रासादों से लेकर टूटी फूटी झोपड़ीयों तक में यह दीपमालिका सजाई जाए और भगवती लक्ष्मी सबके घर में उसी प्रकाश में उतरें। तब हमारा यह पर्व और हम धन्य हो उठेंगे।

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